फ़ॉलोअर

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

प्रसिद्ध साहित्यकार एवं एआईएसएफ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष का. विद्या सागर नौटियाल का शुभकामना संदेश

साथियों,
आल इंडिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन की षष्टिपूर्ति के अवसर पर लखनऊ में एकत्र आप सभी साथियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूं।
इस अवसर पर मुझे वे दिन याद आ रहे हैं जब मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का छात्र सन 1953-60 में था। बीएचयू के एसएफ की पुरानी व गौरवशाली परम्परायें थीं। मद्रास के तेलगू भाषी क्षेत्र के एक जमींदार के पुत्र सी. राजेश्वर राव का अपनी वंशानुगत परंपराओं के अनुसार उच्छृंखल जीवन था। बीएचयू से वातावरण में प्रगतिशील अध्यापकों के प्रभाव में आकर उनकी जीवन-पद्धति परिवर्तित हो गई। उन्होंने मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया और शोषक वर्ग के कट्टर विरोधी बन गये। वे बीएचयू एसएफ में काम करने लगे। बाद में घर लौटने पर वे जालिम जमींदारों पर सशस्त्र क्रान्ति के जन्मदाता बन गये। अपनी जमींदारी की कुल भूमि उन्होंने रैय्यत को बांट दी और एक छोटे से हिस्से पर प्रजाशक्तिनगर में छोटे-छोटे प्लाट पार्टी कार्यकर्ताओं को दे दिए, जिन पर आज का प्रजाशक्तिनगर बसा है।
हमारे युग में एसएफ आम छात्रों के बीच एक शक्तिशाली संगठन बन गया था। उसने वहां के गरीब छात्रों को निकाल बाहर करने के केन्दीय सरकार के निर्णयों के खिलाफ ऐतिहासिक लड़ाईयां लड़ीं। उसी दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ओम प्रकाश मेहरोत्रा अध्यक्ष बनें। आसिफ अंसारी, हरगोविंद डबराल, हरीश गैरोला प्रमुख नेता थे। लखनऊ विश्वविद्यालय में कांग्रेसी सरकार की छात्र विरोधी नीतियों का विरोध करने के कारण मेडिकल कालेज के डा. गैन्डर को गोलियां से भून दिया गया था। उसके बाद लोकप्रिय छात्र नेता रोबिन मित्रा का अध्यक्ष चुना गया। विशेश्वर प्रसाद खंडूड़ी महामंत्री बने। लखनऊ में हैदर अब्बास और अब्दुल मन्नान विशुद्ध हिन्दी में ओजस्वी भाषण देने के कारण छात्रों के बीच अत्यंत प्रभावशाली बन गये और अतिया बनो एसएफ की प्रमुख नेता थीं।
उधर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भारत के प्रमुख छात्र-वक्ता सुल्तान नियाज़ी ने नेतृत्व ग्रहण किया। उनके दोनों भाई इकबाल नियाज़ी और आफताब नियाज़ी भी तूफानी छात्र नेता बन गए। गौरव होता है कि उस दौरान आज के प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब एसएफ के नेता थे।
कलकत्ता में डा. विधान चन्द्र राय के जुल्मों का विरोध करते हुए समस्त छात्र एसएफ से जुड़ गये थे। छोटे-छोटे शहरों के अन्दर भी जो भी आम चुनाव हो पाते उनमें एकएफ के ही प्रत्याशी विजयी होते थे। उस दौरान एआईएसएफ का मुख्यालय भी कलकत्ता में ही था और वहीं से पूरे देश के छात्रों को नेतृत्व मिलता था। आन्ध्र प्रदेश के बन जाने के बाद पूरे आन्ध्र प्रदेश में एस.एफ. का बोलबाला स्थापित हो गया था और दिल्ली विश्वविद्यालय में एसएफ प्रत्याशी हरीश चन्द्र अध्यक्ष बन गये थे।
यू.पी. के देहरादून जैसे सुदूर व उपेक्षित नगर में यूनियन के निर्वाचन में गोविन्द सिंह नेेगी भी प्रमुख नेता बन कर उभरे। यू.पी. के छोटे-छोटे नगरों में भी जैसे कानपुर व बरेली में एसएफ के साथियों ने अपने झंड़े गाड़ दिये थे। इसमें गोरखपुर आदि अनेक शहरों का जिक्र नहीं कर पाया हूं जल्दबाजी के कारण।
उस पूरे दौरान अखिल भारतीय स्तर पर आम छात्रों का नेतृत्व देने वाला कोई भी अन्य विद्यार्थी संगठन नहीं था। मैं महज़ कुछ घटनाओं का जिक्र कर रहा हूं। आप सबको इस बात को याद दिलाने के लिए कि एसएफ की गौरवशाली परम्पराओं को आगे बढ़ाते रहने के लिए आज की परिस्थितियों के अनुसार आप सभी साथियों के कंधों पर जुम्मेदारी आई है।
इस समय मेरा मन आप सबके बीच उपस्थित होने को तड़प रहा है। यह सन्देश मजबूरी में लिखा जा रहा है।
आपका साथी
विद्या सागर नौटियाल
पूर्व अध्यक्ष, एआईएसएफ
1957-1960

1 टिप्पणी:

vijai Rajbali Mathur ने कहा…

विस्तृत जानकारी पा कर प्रसन्नता हुयी।